Monday, July 23, 2007

वो बारिश

अगर कोई हम से पूछे कि तुम्हें कौन सा मौसम पसंद है? तो मेरा जबाब होगा -बरसात.बचपन के दिनों को याद करती हूँ तो अब न वो बारिश रही न ही इस मौसम में वो मज़ा रहा.दिल्ली में अब बारिश बहुत कम होती है.पहले बारिश की ऐसी झड़ी लगाती थी कि हफ्तों तक रुकने का नाम नही लेती थी.पूरे घर में सीलन की बू भर जाती थी.तब वाशिंग मशीन तो था नही लिहाजा बरसात शुरू होते ही घर के बरामदे में गीले कपडे सुखाने के लिए रसियाँ बाँध दी जातीं थीं .सच पूछो तो आज भी कभी किसी तंग गली से गुजरना होता है तो मेरे साथ चल रहे लोग अपनी नाक पर रुमाल रख लेते है पर वो सीलन भरी गंध मुझे खींच कर अपने बचपन के ओर ले जाती है.जिसे आजकल लोग नोस्टालजिया कहते हैं.आजकल यह शब्द ख़ूब चल रहा है.हम सब अपनी जमीन से कटते जा रहें है तो यह शब्द हमें बहुत प्यारा लगने लगा है.सभी बच्चों की तरह मुझे भी बारिश में भीगना अच्छा लगता था.इस मौसम में एक दिन भी स्कूल मिस नही करती थी. बस स्टाप घर के पास था इसलिये रोका नही जाता था.मुझे याद है कि कई बार हम स्कूल पहुचते तो मालूम होता कि रेनी डे होने की वजह से आज स्कूलबंद है। एक रोज़ ऐसे ही मौसम में स्कूल गई तोटीचर ने मुझ से पूछा कि इतनी बारिश में स्कूल क्यों आई? तो हमने कहा कि स्कूल खुल्ला था तो आना ज़रूरी था.यह सुन कर हमारी टीचर को हंसी आ गई .जाने कितनी ही ऐसी छोटी-छोटी बातें हमें अचानक नोस्टालजिक कर देती है।नोट : हम कोई लेखिका या साहित्कर नही है फिर भी पढने -लिखने में कुछ रूचि है इसलिय यह छोटी सी कोशिश है.

4 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

नोस्तैल्जिक तो मैं भी हो गया भाई तानिवी जी.
वो कागज की नावें
वो बारिश का पानी ..........

Avinash Das said...

इष्‍ट देव सांकृत्‍यायन जी, थोड़ा दुरुस्‍त करें: वो काग़ज़ की कश्‍ती, वो बारिश का पानी...

अजित वडनेरकर said...

bahut khoob. aap likhtii rahen.
shabdon ke safar men aane ke lie shukriyaa.

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

आपने तो सचमुच नोस्टालजिक कर दिया...

बूंदों से भरा हुआ छोटा सा समन्दर
लहरों से भीगती छोटी सी बस्ती
चलो लौट आये फिर से बचपन में
हाथों में लेकर कागज़ की कश्ती

और भी कई रंग यादें समेटे हुए हैं... जैसे बरसात में छत से टपकती बूंदों को कटोरी में भरना... खुद भींगते हुए मगर चिट्ठी लिफाफों को करीने से पोस्ट करना वगैरह वैगैरह
मुझे तो चिट्ठियों से आज भी बहुत लगाव है हाल ही में लिखा था http://sulabhpatra.blogspot.com/2009/11/blog-post.html